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प्रभा साक्षी- जेटली ने कहा था भगवान ने सब कुछ दिया, पर स्वास्थ्य नहीं दिया - Vijay Goel

Vijay Goel

प्रभा साक्षी- जेटली ने कहा था भगवान ने सब कुछ दिया, पर स्वास्थ्य नहीं दिया

अरूण जेटली से मेरा पहला परिचय श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में 1971 में हुआ। जब मैंने फर्स्ट ईयर में दाखिला लिया, तब अरूण जेटली सैकेंड ईयर में थे। गोरे−चिट्टे, स्मार्ट, चश्मा लगाए हुए अरूण जेटली मुझे आकर्षक स्वभाव के मालूम हुए। उनके बाल थोड़े बढ़े हुए थे और उन दिनों बड़ी बेलबौटम पहनने का रिवाज था। हम दोनों के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में होने के कारण जल्द ही हमारे संबंध ऐसे बन गए कि आज तक हम साथ−साथ काम करते रहे।

1973 में सैकेंड ईयर में मैं कॉलेज यूनियन के ज्वाइंट सैक्रेटरी के लिए चुनाव लड़ा और अरूण जेटली कॉलेज प्रेजीडेंट के लिए चुनाव लड़े। ऐसा नहीं था कि ये कोई विद्यार्थी परिषद का पैनल था। हम स्वाभाविक रूप से चुनाव में खड़े हुए थे और हम दोनों एक ही छात्र संघ का चुनाव जीत गए। वो प्रेजीडेंट बने और मैं ज्वाइंट सेक्रेटरी। मुझे याद है हमने तब मॉडल टाउन के एक रेस्टोरेंट में बैठकर कॉलेज यूनियन का बजट बनाया था और तब उसको बड़ी गंभीरता से लिया था कि ये बजट लीक नहीं होना चाहिए। आज यह सोचकर हंसी आती है। हमने यूनियन में इकट्ठा काम करना शुरू किया

45 साल पहले कॉलेज के छात्र संघ से जो हमने इकट्ठा काम करना शुरू किया था, वो अब 2019 में राज्य सभा में इकट्ठे काम करने के साथ समाप्त हुआ। वे राज्य सभा में सदन के नेता व मंत्री थे और मैं सदन में पार्लियामेंट्री अफेयर्स मिनिस्टर के रूप में राज्य सभा देखता था।
 
अरूण के बारे में यह कहा जाता है कि वो पहले स्वतंत्र विचारधारा के थे। पर विद्यार्थी परिषद् में आने के बाद वे पूर्णतया संगठन को समर्पित हो गए। हम दोनों अलग−अलग कॉलेजों में इंटर कॉलेज डिबेट के लिए भी जाते थे। उन दिनों 1973 में दिल्ली विश्वविद्यालय में एक बड़ा आन्दोलन हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष श्रीराम खन्ना हमारी अगुवाई कर रहे थे। हम लोग भी उस आन्दोलन में बहुत सक्रिय थे। अकसर विद्यार्थी परिषद् व छात्र संघों और छात्र नेताओं की बैठकें मेरे घर पर हुआ करती थीं, क्योंकि मेरा घर कैम्पस के बहुत पास था। अरूण जेटली भी अकसर मेरे घर आते थे। खुद वे नारायणा विहार के एक मंजिला मकान में रहते थे। वे बस से कॉलेज आया−जाया करते थे। मैंने उनको कभी गाड़ी या स्कूटर चलाते नहीं देखा, शायद उनको चलाना आता भी नहीं था। कभी−कभी वो मेरे टू व्हिलर स्कूटर पर पीछे बैठकर कैम्पस की राजनीति करते थे। उनके और मेरे पिता दोनों वकील थे और दोनों के दफ्तर चांदनी चौक में थे।

 
1974 में अरूण जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने और हम लोग जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन में कूद गए। जयप्रकाश जी हमारे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के दफ्तर में भी आए और मुझे याद है उन्होंने देश भर से आए छात्र नेताओं को संबोधित भी किया। इस आन्दोलन के चलते−चलते आकस्मिक एक दिन 25 जून, 1975 को आपातकाल घोषित हो गया। रात को मेरे पिता चरती लाल गोयल अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिए गए।

अगले दिन सुबह अरूण का फोन आया कि कैम्पस में लड़कों को इकट्ठा करो आपातकाल के खिलाफ जुलूस निकालना है। उस समय हमें इमरजेंसी का मतलब भी नहीं पता था कि इसका स्वरूप कितना भयानक होगा। मैंने सोचा पिताजी को पकड़ लिया गया है, कुछ दिनों में छूट जाएंगे, जैसा पहले नेताओं के साथ होता रहा है और हम कैम्पस में जुलूस निकालने चले गए। ये पूरे देश में इमरजेंसी के खिलाफ पहला प्रदर्शन था। हमारे साथ रजत शर्मा (इंडिया टीवी) भी थे। 200−300 लड़कों का जुलूस निकाल कर हमने कांग्रेस, इंदिरा गांधी और आपातकाल के खिलाफ खूब नारेबाजी की। जुलूस खत्म होने के बाद अरूण जेटली कॉफी हाउस चले गए। मैं और रजत अपने कॉलेज चले गए। शाम तक खबर मिली कि अरूण जेटली गिरफ्तार कर लिए गए हैं। अब हम लोग तो अंडरग्राउंड हो गए। बाद में मैं और रजत दोनों सत्याग्रह करके जेल गए। अरूण जेटली स्टूडेंट्स में हीरो हो गए थे। शुरू में वे अम्बाला जेल गए, जहां मेरे पिता समेत कई नेता बंद थे और बाद में वे अगले 19 महीने खत्म होने तक तिहाड़ जेल में रहे और आपातकाल खत्म होने पर ही छूटे।
 
जब तक हम भूमिगत आन्दोलन में सक्रिय रहे, तब तक अरूण के साथ जेल से हमारा पत्र−व्यवहार होता रहा। जेल में भी उनका मनोबल नहीं टूटा और वे हमको वहीं से चिटि्ठयां लिखते रहे, जो आज भी मेरे पास मौजूद हैं। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में उनकी राइटिंग भले अच्छी न हो, पर दोनों भाषाओं में बोलने में उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी।
 
कॉलेज के दिनों से मेरा और अरूण जेटली का चोली−दामन का साथ रहा। बीच−बीच में हमारे मतभेद भी होते थे। यह ईश्वरीय था कि वो दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के प्रेजीडेंट बने, उसके बाद मैं बना। दोनों ने कैम्पस लॉ फेकल्टी से कानून की पढ़ाई की और वहीं से यूनिवर्सिटी के प्रेजीडेंट बने। हम दोनों ही तिहाड़ जेल में रहे। पहले वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रेजीडेंट थे, उनके बाद मैं बना। वो बीजेपी ऑल इंडिया के महासचिव रहे, बाद में मैं उनके साथ बना। लॉ के बाद राजनीति में रहते−रहते वो वकालत करने लग गए और मैं कागज के व्यापार में चला गया। संयोग से मुझे सांसद होने का मौका पहले मिला, वे भी सांसद बने इसके बाद हम दोनों वाजपेयी सरकार में साथ−साथ मंत्री रहे। वे सूचना एवं प्रसारण व कानून मंत्री बने और मैं उनके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री बन गया। लॉटरी बंद करवाने की मुहिम में भी उन्होंने मेरा साथ दिया था।
 
अरूण का दिल्ली में एक बार लोक सभा चुनाव लड़ने का मन भी बन गया था, पर सबकी सहमति न बनने के कारण वे चुनाव न लड़कर, लड़वाने वाली टीम में एक बार जो शामिल हुए, तो फिर वे चुनाव अभियानों में जुटे रहे। उनको लक्की मस्कोट माना गया, जिस भी राज्य के चुनाव प्रभारी बने, वहां पार्टी चुनाव अवश्य जीती। लोक सभा में न जाने का उनको मलाल जरूर रहा। उनको दुख था कि अमृतसर में भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया।

अटल जी और आडवाणी जी ने हमारे साथ बहुत−से युवाओं को आगे बढ़ाया। अरूण जेटली के साथ−साथ उस समय प्रमोद महाजन, अनंत कुमार, सुषमा स्वराज, वैंकेया नायडू जैसों की बहुत अच्छी टीम थी। अरूण उन नेताओं में रहें, जिनकी समान रूप से सब क्षेत्रों में पकड़ थी। चाहे वो दूसरी पार्टी के नेता हों या फिर मीडिया ग्रुप के संपादकों से रिपोर्टरों तक। बड़े−बड़े उद्योगपतियों से लेकर वे छोटे से छोटे कार्यकर्त्ता से भी जुड़े हुए थे। उनकी खासियतों को अगर गिनाऊं तो वे आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों पर उनकी समान रूप से पकड़ थी। संसद और संसद के बाहर बहुत अच्छे वक्ता रहे। ज्ञान के वे भंडार थे, किसी भी विषय पर कभी भी वे बोल सकते थे। जानकारियां उनके पास हमेशा रहती थीं।
 
अटल और मोदी सरकारों में उनको संकटमोचक माना जाता रहा। अकसर वे सेल्फ इनीशिएटिव लेकर अपने से बड़े नेताओं को सलाह दिया करते थे। जहां तक मुझे ध्यान आता है, देश भर के सभी सांसदों और विधायकों से उनका परिचय था। शाम के समय वे कार्यक्रमों में भाग लेते थे और वहां गप−शप करना उनका शौक था। मेरे घर पर अकसर होने वाले कार्यक्रमों में वे आते और सबसे मिला करते थे। खाने के शौकीन थे, इसलिए उन्होंने कभी अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया। मेरे यहां आते थे तो कहते थे, परांठे जरूर बनवाना। उन्हें अमृतसरी छोले−भटूरे बहुत पसंद थे।
 
हम लोगों ने पतंग उड़ाने से लेकर लगभग खेलना, बैठना, पढ़ना, राजनीति करना सारे काम एक साथ किए। अकसर वो अपने जन्मदिन पर पॉलिटिकल आदमी को पार्टी में नहीं बुलाते थे। किन्तु मुझे कहते थे, तुम तो मेरे दोस्त हो, इसलिए तुम जरूर आना। हमारी मित्र मंडली में बहुत−से साझा मित्र हैं। अरूण जेटली के लेख और ब्लॉग बड़े प्रसिद्ध रहे। पार्टी के हर दिए हुए काम को वो पूरा करते थे। अपनी बात को वो बेबाक रूप से रखते, किन्तु उसके बाद जो पार्टी तय करती थी, उस पर चलते। जिन लोगों के साथ उनकी नहीं जम पाई, उसकी उन्होंने कभी चिन्ता भी नहीं की।
 
उस दिन मैं बहुत भावुक हो गया, जब उन्होंने मुझसे कहा कि भगवान ने मुझे सब कुछ दिया, स्वास्थ्य नहीं दिया। वित्त मंत्री बनने से पहले वो लोदी गार्डन में सैर करने जाते थे। बाद में उन्होंने घर पर ही सैर करनी शुरू की। अकसर वो रंजन भट्टाचार्य और कभी−कभी मुझे भी सैर करने के लिए बुला लिया करते थे। अपने परिवार वालों से उनका बहुत लगाव रहा। वे अकसर मुझे बताते थे कि किस आदमी की उन्होंने कैसे−कैसे मदद की। खास तौर से किसी बड़े या छोटे नेता का स्वास्थ्य खराब हो जाए तो वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके एम्स से लेकर मेदांता तक उसका इलाज करवाते थे।
 
जेटली परिवार की कुलदेवी बगलामुखी माता का मंदिर हमारी हवेली धर्मपुरा के पास नाईवाड़ा में है, जहां उनके परिवार वाले अक्सर पूजा करने के लिए जाते हैं। यूं मैंने उनको बाकी कभी ज्यादा धार्मिक स्थलों पर जाते नहीं देखा। उनको क्रिकेट का बहुत शौक रहा। वो डीडीसीए के प्रेजीडेंट बने। अकसर क्रिकेट मैच स्टेडियम या टीवी में बड़े चाव से देखते थे और क्रिकेट के आंकड़े उनकी अंगुलियों पर होते थे। अरूण जेटली कभी विवादों में भी रहे, पर कभी उन्होंने हार नहीं मानी। जब केजरीवाल ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो उन्होंने देश का वित्त मंत्री होते हुए कोर्ट में खड़े होकर उसका सामना किया और अंत में केजरीवाल को माफी मांगनी पड़ी। चाहे राजनीति हो या घर−परिवार की बात हो वो खुल कर मेरे से बात किया करते थे।
  
अरूण जेटली एक प्रसिद्ध वकील, एक ईमानदार नेता, एक बुद्धिमान व्यक्तित्व, एक प्रभावी वक्ता, एक कुशल रणनीतिकार और एक अच्छे मंत्री के रूप में जाने जाएंगे। राजनीति उनकी अपनी पसन्द थी, पर उन्होंने राज भी किया और नीतियां भी बनाईं। मुझे नहीं याद आता कि इतने सारे क्षेत्रों में इतना लम्बा 45 वर्षों का साथ मेरा किसी और के साथ रहा हो, जिसमें इतने सारे खट्ठे−मीठे अनुभव हों।
 
-विजय गोयल
(लेखक राज्य सभा सांसद हैं)
 


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My visions for Delhi stems from these inspiring words of Swami Vivekanada. I sincerely believe that Delhi has enough number of brave, bold men and women who can make it not only one of the best cities.

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